Wednesday, 25 January 2017

शराब

पीना  और  पिलाना  हमारा  शौख  बन  चूका  है 
ये  ज़माना  हमारे  लिए  खौफ  बन  चूका  है 
इलाज-ऐ-गम  की  दावा  है  ये  शराब  हमारे  दिल  की 
ये  मोहोब्बत  हमारे  लिए  रोग  बन  चूका  है……............….!!

D K

एक गुनाह

खता-ऐ-दिल  मैँ एक  खराब  कर  बैठा 
अपनी  ज़िन्दगी  को  मैँ  शराब  कर  बैठा 
इस  इश्क़  को  समझ  कर  ज़िन्दगी  अपनी 
एक गुनाह मैँ  बेहिसाब  कर  बैठा……….................!!

D K

पत्थऱ



ना आभास-ऐ-दर्द दिल में 
ना अपनेपन  का  कोई  अहसास 

लोग  लात  मरते  चलते  है 
रास्ते  का  एक  पत्थऱ  हू  में….............!!

D K

Tuesday, 24 January 2017

इश्क़



इस इश्क़  में  इंतज़ार  कितना  मुश्किल  होता  है 
दिल  को  संभालना  कितना  मुश्किल  होता  है 
हर  एक  पल  कटता है  सदियों की  तरह  
इस  इश्क़  में  इतमिनान  कितना  मुश्किल  होता  है...............!!  

D K

हर पल..........


टूटना  और  बिखरना  चलता  रहा  मेरी  ज़िन्दगी  में
टूट  टूट  कर  बस  बिखरता  रहा  हर  पल 

हालत-ऐ-ज़िन्दगी  ने  मुझे  मजबूर  कर  दिया  और  मैँ 
गिर  गिर  कर  संभालता  रहा  हर  पल 

न  कोई  ठिकाना  बचा, न  किसी  मंज़िल  की  तलब
धीरे  धीरे  चलता  रहा  हर  पल 

दर्द  तो  था  दिल  में  मगर  बर्दाश्त-ऐ-सादगी  भी 
एक  कमल  की  तरह  खिलता  रहा  हर  पल 

गिररफ्त-ऐ-तन्हाई  और  खुवाईश-ऐ-दिल  की  हर  ज़ुस्तज़ू 
मछली  की  तरह  तड़पता  रहा  हर  पल 

न  देखा  उसने  कभी  मूड  कर , न  दिल-ऐ-फर्याद  हुई  कोई 
अरमान-ऐ-दिल  के  हाथों  मरता  रहा  हर  पल 

चिराग-ऐ-रोशनी  और  न  उजाला-ऐ-ज़िन्दगी 
अपने  दिल  के  साथ  जलता  रहा  हर  पल 

टूटना  और  बिखरना  चलता  रहा  मेरी  ज़िन्दगी  में
टूट  टूट  कर  बस  बिखरता  रहा  हर  पल ........................................!!

D K

मैं एक गरीब दिखता हू


मैं रोज सबेरे दर्पण  देखता  हू 
मैं  रोज  सबेरे  अपनी  हालत  देखता  हू 
दिखता  नहीं  कुछ  भी  मुझे  बदला  सा 
मैं  एक  गरीब  दिखता  हू 

जब  भी  निकलता  हू  रास्तों पर मैं 
खुद  को  असहाय  पाता  हू 
सब  यही  सोचते  होंगे  मुझे  देख  कर 
मैं  एक  गरीब  दिखता  हू 

कसूर  क्या  है  मेरा  मैं  नहीं  जानता  हू 
सबको  मुझ  से  ही  इतनी  नफरत  क्यों है 
पाते  पुराने  कपडे  है  मेरे 
मैं  एक  गरीब  दिखता  हू 

सब  देखते  है मुझको  गलत  निगहा  से 
सब  की  आंखों  मे  मैं  खटकता  हू 
सब  मुझे  हर  जगह  दुत्कारते  है 
मैं  एक  गरीब  दिखता  हू 

मैं रोज सबेरे दर्पण  देखता  हू 
मैं  रोज  सबेरे  अपनी  हालत  देखता  हू 
दिखता  नहीं  कुछ  भी  मुझे  बदला  सा 
मैं  एक  गरीब  दिखता  हू ............................................!!

D K

Alfaz aur Kalam

Likhta Hu Main Aksar Kalam Ka Khayaal Karke…!!
Alfaaz Bhi Machal Jaate Hai Khud Ko Bayaan Karke…!!
Kashmakash Kuch Aaisi Bhi Rehti Hai Dono Ke Darmiyaan…!!
Alfaaz Nikalte Hai Emtihaa Karke, Kalam Likhte Hai Etminaa Karke…!!

ख्याल करती,बेहाल करती……..

शुक्र है मोहोब्बत का कोई मज़हब नहीं होता 
वर्ना ये भी अमीरी और गरीबी का ख्याल करती
मिल जाती हर शक्श-ऐ-आमिर को 
और हम जैसो को ये बेहाल करती……………………………!!
D K

बहुत रो चुके है……..

सुकून हम अपने दिल का अब कहू चुके है 
हम खुद को गम-ऐ-सागर में डुबो चुके है 
क्यों मजबूर करते हो हमें, ये खत दिखा कर 
हम पहले से ही उदास है, बहुत रो चुके है………………….!!
D K

वो मुँह छुपा-छुपा कर रोये……..

हमको तन्हाई में बुला-बुला कर रोये 
अपने आंसुओं को छुपा-छुपा कर रोये
जब देखी उस ने हमारी सिद्क़-ऐ-दिल लोगो 
अपने ही आँचल में, वो मुँह छुपा-छुपा कर रोये…………….!!
D K