टूटना और बिखरना चलता रहा मेरी ज़िन्दगी में
टूट टूट कर बस बिखरता रहा हर पल
हालत-ऐ-ज़िन्दगी ने मुझे मजबूर कर दिया और मैँ
गिर गिर कर संभालता रहा हर पल
न कोई ठिकाना बचा, न किसी मंज़िल की तलब
धीरे धीरे चलता रहा हर पल
दर्द तो था दिल में मगर बर्दाश्त-ऐ-सादगी भी
एक कमल की तरह खिलता रहा हर पल
गिररफ्त-ऐ-तन्हाई और खुवाईश-ऐ-दिल की हर ज़ुस्तज़ू
मछली की तरह तड़पता रहा हर पल
न देखा उसने कभी मूड कर , न दिल-ऐ-फर्याद हुई कोई
अरमान-ऐ-दिल के हाथों मरता रहा हर पल
चिराग-ऐ-रोशनी और न उजाला-ऐ-ज़िन्दगी
अपने दिल के साथ जलता रहा हर पल
टूटना और बिखरना चलता रहा मेरी ज़िन्दगी में
टूट टूट कर बस बिखरता रहा हर पल ........................................!!
D K
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