मैं रोज सबेरे दर्पण देखता हू
मैं रोज सबेरे अपनी हालत देखता हू
दिखता नहीं कुछ भी मुझे बदला सा
मैं एक गरीब दिखता हू
जब भी निकलता हू रास्तों पर मैं
खुद को असहाय पाता हू
सब यही सोचते होंगे मुझे देख कर
मैं एक गरीब दिखता हू
कसूर क्या है मेरा मैं नहीं जानता हू
सबको मुझ से ही इतनी नफरत क्यों है
पाते पुराने कपडे है मेरे
मैं एक गरीब दिखता हू
सब देखते है मुझको गलत निगहा से
सब की आंखों मे मैं खटकता हू
सब मुझे हर जगह दुत्कारते है
मैं एक गरीब दिखता हू
मैं रोज सबेरे दर्पण देखता हू
मैं रोज सबेरे अपनी हालत देखता हू
दिखता नहीं कुछ भी मुझे बदला सा
मैं एक गरीब दिखता हू ............................................!!
D K
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